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HINDI CLASS- 7: मल्हार

CHAPTER-8: (बिरजू महाराज से साक्षात्कार)

CBSEChapter-8 Solutions

बिरजू महाराज से साक्षात्कार

मेरी समझ से

(क)(1) बिरजू महाराज ने गंडा बाँधने की परंपरा में परिवर्तन क्यों किया होगा?

सही उत्तर:
• वे गुरु के प्रति शिष्य के निष्ठा भाव को परखना चाहते थे।
• वे नृत्य के प्रति शिष्य की लगन व समर्पण भाव को जाँचना चाहते थे।

बिरजू महाराज का मानना था कि केवल भेंट देने से कोई अच्छा शिष्य नहीं बन जाता। वे कई वर्षों तक शिष्य को सिखाने के बाद उसकी लगन, मेहनत और समर्पण देखकर ही गंडा बाँधते थे। इससे गुरु-शिष्य संबंध की पवित्रता बनी रहती थी।



(क)(2) “जीवन में उतार-चढ़ाव तो होता ही है।” बिरजू महाराज के जीवन में किस तरह के उतार-चढ़ाव आए?

सही उत्तर:
• पिता के देहांत के बाद आर्थिक अभावों का सामना करना पड़ा।
• किसी समय विशेष में घर में सुख-समृद्धि थी।

बचपन में उनके परिवार में सुख-समृद्धि थी और उन्हें छोटे नवाब कहा जाता था। लेकिन पिता के निधन के बाद आर्थिक कठिनाइयाँ बढ़ गईं। कई बार भोजन तक की समस्या हो जाती थी। फिर भी उन्होंने कठिन परिश्रम और अभ्यास से सफलता प्राप्त की।



(क)(3) बिरजू महाराज के अनुसार बच्चों को लय के साथ खेलने की अनुशंसा क्यों की जानी चाहिए?

सही उत्तर:
• कला संबंधी विषयों से जुड़ाव बच्चों के बौद्धिक विकास के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
• कला भी एक खेल है, जिसमें बहुत कुछ सीखने को मिलता है।

बिरजू महाराज के अनुसार संगीत और नृत्य बच्चों में संतुलन, अनुशासन, समय का सदुपयोग और रचनात्मकता विकसित करते हैं। इसलिए बच्चों को लय और कला से जुड़ने के अवसर मिलने चाहिए।



(ख) आपने ये उत्तर ही क्यों चुने?

मैंने ये उत्तर इसलिए चुने क्योंकि वे साक्षात्कार में व्यक्त बिरजू महाराज के विचारों और जीवन अनुभवों को सही रूप में प्रस्तुत करते हैं। उन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी अभ्यास नहीं छोड़ा, गुरु-शिष्य परंपरा को महत्व दिया तथा बच्चों के बौद्धिक और सांस्कृतिक विकास के लिए कला को आवश्यक बताया। यही बातें पूरे साक्षात्कार का मुख्य संदेश हैं।



मिलकर करें मिलान

शब्दों का सही मिलान कीजिए।

1. कर्नाटक संगीत शैली → 2. भारतीय शास्त्रीय संगीत की वह शैली जो मुख्य रूप से दक्षिण भारत में प्रचलित है।

2. घराना → 4. संगीत या नृत्य की परंपरा, जिसमें शैली और सिद्धांत पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ते हैं।

3. शास्त्रीय संगीत → 1. भारत की प्राचीन गायन-वादन और नृत्य परंपरा, जिसमें नियमों की प्रधानता होती है।

4. हिंदुस्तानी संगीत शैली → 6. भारतीय शास्त्रीय संगीत की वह शैली जो मुख्य रूप से उत्तर भारत में प्रचलित है।

5. कर्णछेदन → 3. हिंदू धर्म के सोलह संस्कारों में से एक, जो कान में आभूषण धारण करने से संबंधित है।

6. लोक नृत्य → 5. किसी क्षेत्र विशेष की संस्कृति और परंपराओं से जुड़े पारंपरिक नृत्य।



पंक्तियों पर चर्चा

“तुम नौकरी में बँट जाओगे। तुम्हारे अंदर का नर्तक पूरी तरह पनप नहीं पाएगा।”

इस कथन के माध्यम से बिरजू महाराज के चाचा यह कहना चाहते थे कि नौकरी करने से उनका पूरा समय और ऊर्जा नृत्य को नहीं मिल पाएगी। इससे उनकी कला का विकास सीमित हो सकता था। लेकिन बिरजू महाराज ने दृढ़ निश्चय और मेहनत के बल पर नौकरी और कला दोनों में संतुलन बनाया तथा महान कलाकार बने।



“नृत्य में शरीर, ध्यान और तपस्या का साधन होता है।”

इस पंक्ति का अर्थ है कि नृत्य केवल शारीरिक गतिविधि नहीं है। इसके लिए मन की एकाग्रता, निरंतर अभ्यास और समर्पण की आवश्यकता होती है। नृत्य एक साधना है, जो कलाकार के व्यक्तित्व को निखारती है और उसे अनुशासन सिखाती है।



“कथक में गर्दन को हल्के से हिलाया जाता है, चिराग की लौ के समान।”

इस पंक्ति में कथक नृत्य की कोमलता और सौंदर्य का वर्णन किया गया है। कथक में प्रत्येक मुद्रा और अंग-संचालन बहुत संतुलित और नियंत्रित होता है। गर्दन की हल्की गति दीपक की लौ की तरह सुंदर और आकर्षक दिखाई देती है।



सोच-विचार के लिए

(1)(क) बिरजू महाराज नृत्य का औपचारिक प्रशिक्षण आरंभ होने से पहले ही कथक कैसे सीख गए थे?

बिरजू महाराज का जन्म कथक कलाकारों के परिवार में हुआ था। घर में हमेशा कथक का वातावरण रहता था। वे अपने पिता और चाचाओं को नृत्य करते हुए देखते थे। लगातार देखकर और अभ्यास करके उन्होंने औपचारिक प्रशिक्षण शुरू होने से पहले ही कथक की अनेक बारीकियाँ सीख ली थीं।



(1)(ख) नृत्य सीखने के लिए संगीत की समझ होना क्यों अनिवार्य है?

नृत्य और संगीत एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। नृत्य में लय, ताल और स्वर का ज्ञान आवश्यक होता है। संगीत की समझ होने पर कलाकार सही गति, भाव और तालमेल के साथ प्रस्तुति दे सकता है। इसलिए संगीत का ज्ञान नृत्य को प्रभावशाली बनाता है।



(1)(ग) नृत्य के अतिरिक्त बिरजू महाराज को और किन-किन कार्यों में रुचि थी?

नृत्य के अलावा बिरजू महाराज को गायन, वादन, संगीत रचना, चित्रकला तथा मशीनों के बारे में जानने में रुचि थी। उन्हें तबला और हारमोनियम बजाना पसंद था। वे चित्र भी बनाते थे और मशीनों को खोलकर उनके पुर्जों को समझने का शौक रखते थे।



(1)(घ) बिरजू महाराज ने बच्चों की शिक्षा और रुचियों के बारे में अभिभावकों से क्या कहा है?

बिरजू महाराज ने अभिभावकों से कहा कि यदि बच्चों की रुचि संगीत या नृत्य में है तो उन्हें प्रोत्साहित करना चाहिए। कला बच्चों के बौद्धिक विकास, अनुशासन, संतुलन और समय प्रबंधन में सहायता करती है। इसलिए बच्चों की रुचियों का सम्मान करना आवश्यक है।



(2)(क) किन प्रसंगों से पता चलता है कि बिरजू महाराज बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे?

बिरजू महाराज केवल महान कथक नर्तक ही नहीं थे, बल्कि वे गायक, वादक, संगीतकार और चित्रकार भी थे। उन्हें तबला और हारमोनियम बजाने में दक्षता प्राप्त थी। वे नृत्य-नाटिकाओं के लिए संगीत तैयार करते थे तथा चित्रकारी का भी शौक रखते थे। इन सभी गुणों से उनकी बहुमुखी प्रतिभा स्पष्ट होती है।



(2)(ख) बिरजू महाराज को नृत्य की ऊँचाइयों तक पहुँचाने में उनकी माँ का बहुत योगदान रहा। स्पष्ट कीजिए।

बिरजू महाराज की माँ ने कठिन आर्थिक परिस्थितियों में भी उनका उत्साह बढ़ाया। वे हमेशा उन्हें नियमित अभ्यास करने के लिए प्रेरित करती थीं। कई बार घर में भोजन की कमी होने पर भी उन्होंने बेटे की कला-साधना रुकने नहीं दी। उनकी प्रेरणा, त्याग और सहयोग ने बिरजू महाराज को सफलता के शिखर तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।



(2)(ग) बिरजू महाराज महिलाओं के लिए समानता के पक्षधर थे। कैसे?

बिरजू महाराज का मानना था कि लड़कियों को भी शिक्षा और कोई-न-कोई हुनर अवश्य सीखना चाहिए ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें। उन्होंने अपनी बेटियों को कथक सिखाया और महिलाओं की शिक्षा तथा कला में भागीदारी का समर्थन किया। उनके विचार महिलाओं के प्रति समानता और सम्मान को दर्शाते हैं।