Chapter Solution
पाठः-6 — मनःपूतं समाचरेत्
१. अधः प्रदत्तानां प्रश्नानां पूर्णवाक्येन उत्तरं लिखत —
| प्रश्नः |
उत्तरम् |
| (क) लोकः कस्य आचरणम् अनुकरोति? |
लोकः श्रेष्ठस्य आचरणम् अनुकरोति। |
| (ख) कीदृशी वाणी वक्तव्या? |
सत्यपूता वाणी वक्तव्या। |
| (ग) लक्ष्मीः कम् उपैति? |
लक्ष्मीः उद्योगिनं पुरुषसिंहम् उपैति। |
| (घ) उत्तमजनाः कार्यं प्रारभ्य किं न कुर्वन्ति? |
उत्तमजनाः कार्यं प्रारभ्य कार्यं न परित्यजन्ति। |
| (ङ) धर्मस्य लक्षणानि कानि? |
धृतिः, क्षमा, दमः, अस्तेयम्, शौचम्, इन्द्रियनिग्रहः, धीः, विद्या, सत्यम्, अक्रोधः च धर्मस्य लक्षणानि सन्ति। |
| (च) सकलाः कलाः कस्मात् सिद्ध्यन्ति? |
सकलाः कलाः अभ्यासात् सिद्ध्यन्ति। |
| (छ) सम्पदः कं वृणते? |
गुणलुब्धाः सम्पदः विमृश्यकारिणं वृणते। |
२. अधोलिखितेषु श्लोकांशेषु रिक्तस्थानानि पूरयत —
- अविवेकः परमापदां पदम्।
- सन्तः परीक्ष्य अन्यतरद् भजन्ते।
- दैवं निहत्य कुरु पौरुषम् आत्मशक्त्या।
- स यत् प्रमाणं कुरुते।
- धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्।
३. रेखाङ्कितानि पदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत —
| दत्तवाक्यम् |
प्रश्नवाक्यम् |
| नीचैः विघ्नभयेन कार्यं न प्रारभ्यते। |
कैः विघ्नभयेन कार्यं न प्रारभ्यते? |
| सकलाः कलाः अभ्यासात् सिद्ध्यन्ति। |
सकलाः कलाः कस्मात् सिद्ध्यन्ति? |
| वस्त्रपूतं जलं पिबेत्। |
कीदृशं जलं पिबेत्? |
| लक्ष्मीः पुरुषसिंहम् उपैति। |
लक्ष्मीः कम् उपैति? |
| सन्तः परीक्ष्य अन्यतरद् भजन्ते। |
के परीक्ष्य अन्यतरद् भजन्ते? |
| क्रियां सहसा न विदधीत। |
कां सहसा न विदधीत? |
४. अधोलिखितं श्लोकं पठित्वा प्रश्नानाम् उत्तराणि लिखत —
दृष्टिपूतं न्यसेत् पादं वस्त्रपूतं जलं पिबेत्।
सत्यपूतां वदेत् वाचं मनःपूतं समाचरेत्॥
| प्रश्नः |
उत्तरम् |
| (क) अस्मिन् श्लोके प्रथमं क्रियापदं किम्? |
अस्मिन् श्लोके प्रथमं क्रियापदं न्यसेत् अस्ति। |
| (ख) कं न्यसेत्? |
पादं न्यसेत्। |
| (ग) कीदृशं पादं न्यसेत्? |
दृष्टिपूतं पादं न्यसेत्। |
| (घ) द्वितीयं किं क्रियापदम् अस्ति? |
द्वितीयं क्रियापदं पिबेत् अस्ति। |
| (ङ) किं पिबेत्? |
जलं पिबेत्। |
| (च) कीदृशं जलं पिबेत्? |
वस्त्रपूतं जलं पिबेत्। |
| (छ) तृतीयं किं क्रियापदम् अस्ति? |
तृतीयं क्रियापदं वदेत् अस्ति। |
| (ज) कां वदेत्? |
वाचं वदेत्। |
| (झ) कीदृशीं वाणीं वदेत्? |
सत्यपूतां वाणीं वदेत्। |
| (ञ) चतुर्थं किं क्रियापदम् अस्ति? |
चतुर्थं क्रियापदं समाचरेत् अस्ति। |
| (ट) कथं समाचरेत्? |
मनःपूतं समाचरेत्। |
५. मञ्जूषातः पदानि चित्वा भावार्थेषु रिक्तस्थानानि पूरयत —
मञ्जूषा:
बुद्धिः, लक्ष्यं, पुरुषस्य, अभिप्रायं, धीराः, नूतनम्
| भागः |
पूर्ण वाक्यम् |
| (क) |
लक्ष्मीः प्रयत्नशीलस्य पराक्रमिणः पुरुषस्य समीपं
स्वयम् आगच्छति। कापुरुषाः तु ‘विधिः एव बलीयान्’ इति वदन्ति।
ये पौरुषेण परिस्थितिम् अतिक्रम्य कार्याणि साधयन्ति ते एव
धीराः। प्रयत्नं कृत्वा अपि यदि
लक्ष्यं न प्राप्तं तर्हि तत्र दोषः नास्ति खलु।
|
| (ख) |
पुरातनम् अस्ति इति कारणेन किमपि वस्तु तत्त्वं व्यक्तित्वं वा
समीचीनं भवेदेव इति नियमः नास्ति। तथैव नूतनम्
अस्ति इति कारणेन दोषरहितं भवेत् इत्यपि नियमः नास्ति।
येषां बुद्धिः पक्वा अस्ति ते परीक्षण-निरीक्षणानन्तरम्
एव उत्तमं स्वीकुर्वन्ति। किन्तु अज्ञानाः अन्येषाम्
अभिप्रायं श्रुत्वा तदनुसारेण प्रवर्तन्ते।
|
६. श्लोकानाम् अन्वयेषु रिक्तस्थानानि पूरयत —
(क)
सर्वाः क्रियाः अभ्यासेन सिध्यन्ति।
सकलाः कलाः अभ्यासात् सिध्यन्ति।
ध्यानमौनादि (अपि) सिध्यति।
अभ्यासस्य दुष्करं किम् अस्ति?
(ख)
श्रेष्ठः यत् यत् आचरति इतरः जनः तत् तत् एव आचरति।
सः यत् प्रमाणं कुरुते, लोकः तत्
अनुवर्तते।
७. यथोचितं मेलनं कुरुत —
| श्लोकांशः |
स्रोतोग्रन्थः |
| (क) पुराणमित्येव न साधु साधुर्वं न चापि काव्यं नवमित्यवद्यम्। |
४. मालविकाग्निमित्रम् |
| (ख) प्रारभ्य चोत्तमजनाः न परित्यजन्ति। |
३. नीतिशतकम् |
| (ग) यद्यदाचरति श्रेष्ठः। |
५. श्रीमद्भगवद्गीता |
| (घ) धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयम्। |
१. मनुस्मृतिः |
| (ङ) उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः। |
२. पञ्चतन्त्रम् |
८. रेखाङ्कितेषु पदेषु सन्धिविच्छेदं कुरुत —
| सन्धियुक्त पदम् |
सन्धिविच्छेदः |
| दमोऽस्तेयम् |
दमः + अस्तेयम् |
| पुराणमित्येव |
पुराणम् + इति + एव |
| पुनरपि |
पुनः + अपि |
| प्रारभ्य चोत्तमजनाः |
प्रारभ्य + च + उत्तमजनाः |
| विघ्नविहता |
विघ्नैः + विहताः |
| लोकस्तदनुवर्तते |
लोकः + तत् + अनुवर्तते |
| परीक्ष्यान्यतरद्भजन्ते |
परीक्ष्य + अन्यतरत् + भजन्ते |
९. विग्रहवाक्यानि दत्तानि सन्ति। तेषां समस्तपदानि पाठात् चित्वा लिखत —
| विग्रहवाक्यम् |
समस्तपदम् |
| यथा — मनसा पूतं समाचरेत्। |
मनःपूतम् |
| (क) विघ्नैः विहताः (कार्यात्) विरमन्ति। |
विघ्नविहताः |
| (ख) वस्त्रेण पूतं जलं पिबेत्। |
वस्त्रपूतम् |
| (ग) पुरुषः सिंहः इव तम् उपैति लक्ष्मीः। |
पुरुषसिंहम् |
| (घ) उत्तमाः जनाः न परित्यजन्ति। |
उत्तमजनाः |
| (ङ) न विवेकः परमापदां पदम्। |
अविवेकः |
पाठ का मुख्य संदेश
इस पाठ में यह शिक्षा दी गई है कि मनुष्य को कोई भी कार्य
शुद्ध मन, उचित विचार और विवेक के साथ करना चाहिए।
अभ्यास से सभी कार्यों में सिद्धि प्राप्त होती है और श्रेष्ठ व्यक्ति
अपने आचरण से समाज के लिए आदर्श प्रस्तुत करते हैं। कठिनाइयों के
कारण उत्तम व्यक्ति अपने कार्य को नहीं छोड़ते, बल्कि बार-बार प्रयास
करते हुए सफलता प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं।
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